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न सुरक्षा, न एम्बुलेंस, न जवाबदेही — कैमोर हादसे ने खोल दी प्रशासन की पोल.

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No safety, no ambulance, no accountability — the Kamor tragedy exposes the administration’s failure.

Special Correspondent, Katni, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, कटनी। कैमोर थाना क्षेत्र के तिलक चौक के समीप बम्हनगवां शासकीय प्राथमिक शाला में हुई दर्दनाक घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। दोपहर लगभग 12 बजे स्कूल परिसर में शौचालय के पास बनी जर्जर बाउंड्री वॉल अचानक भरभराकर गिर गई। उसकी चपेट में आकर 10 वर्षीय छात्र राजकुमार बर्मन गंभीर रूप से घायल हो गया और उपचार शुरू होने से पहले ही उसकी मौत हो गई।

जानकारी के अनुसार रपटा स्थित एमपीईबी कार्यालय के पास की बस्ती में रहने वाला मासूम रोज की तरह स्कूल आया था, लेकिन वर्षों से चली आ रही लापरवाही और जर्जर व्यवस्था ने उसकी जिंदगी छीन ली।

हादसे के बाद एम्बुलेंस को कॉल किया गया, लेकिन समय पर वाहन उपलब्ध नहीं हो सका। मजबूरी में घायल बच्चे को ऑटो से शासकीय चिकित्सालय विजयराघवगढ़ ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यह पूरी घटना जिले की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

घटना के बाद क्षेत्र में भारी आक्रोश है। स्कूल भवन की सुरक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर नागरिकों में गुस्सा साफ नजर आ रहा है।

बताया गया है कि मृतक छात्र के पिता का डेढ़ वर्ष पहले टीबी से निधन हो चुका था। उसकी मां लोगों के घरों में काम करने के साथ-साथ शाम को फुल्की-चाट बेचकर अपने बेटे का पालन-पोषण कर रही थी। इस हृदयविदारक हादसे ने न सिर्फ एक गरीब परिवार का सहारा छीन लिया, बल्कि सरकारी स्कूलों और सार्वजनिक ढांचों की वर्षों से हो रही उपेक्षा को भी उजागर कर दिया है।

जर्जर बाउंड्री वॉल की रक्षा करती रही मदहोश व्यवस्था

शाला की पुरानी बाउंड्री वॉल वर्षों से जर्जर हालत में थी। स्कूल के प्रधानाध्यापकों द्वारा शिक्षा विभाग को पहले ही इसकी सूचना दी जा चुकी थी, लेकिन न जाने किन फाइलों और किन मदों में दर्जनों जनप्रतिनिधि और सैकड़ों अफसर उलझे रहे — किसी ने इस मौत को रोकने की जहमत नहीं उठाई।

आज वही सड़ा-गला सिस्टम एक उजड़े परिवार पर मुठ्ठी-भर मुआवजे का मरहम लगाने आगे आएगा और शासन-प्रशासन की तारीफों के ओवरब्रिज खड़े करेगा।

कहां भटकती हैं एम्बुलेंस की रूहें

जब किसी साधनहीन परिवार पर आपदा टूटती है, तभी लोकहितकारी व्यवस्था की सड़ांध सूबे में फैलती है। इस बदबू को खत्म करने के लिए दूरदर्शी कदम कभी नहीं उठाए जाते। हां, हर हादसे के बाद संवेदना और वादों की कागजी गूंज जरूर सुनाई देती है।

सवाल आज भी भूत की तरह सामने खड़ा है —
आखिर सरकारी, उद्योगों की और निजी दान से मिली एम्बुलेंसों की रूहें कहां भटकती रहती हैं, जो गरीब की पुकार पर समय पर नहीं पहुंचतीं?

किसी प्रभावशाली परिवार की पालतू बिल्ली को कांटा लग जाए तो पूरा सिस्टम पलक झपकते दरवाजे पर खड़ा हो जाता है। यह असमानता संविधान की आत्मा को लज्जित करती है।

छह साल पहले बनी सीएसआर की दीवार भी लड़खड़ा रही

इस स्कूल की नई बाउंड्री वॉल ACC सीमेंट कारखाने की सीएसआर (लोककल्याण मद) से वर्ष 2019-20 में बनवाई गई थी। महज छह साल में ही वह भी जर्जर होकर लड़खड़ा रही है और कभी भी गिर सकती है।

एक बात तय है — अगर यह दीवार भी गिरती है, तो उसके लिए भी कोई न कोई जिम्मेदार जरूर होगा… या फिर हमेशा की तरह कोई नहीं।

टूटे सपनों के साथ अब मां क्या करेगी

अव्यवस्थाओं की बलि अपनी इकलौती संतान देकर चढ़ाने वाली मां शिवकुमारी बर्मन, जो फुल्की बेचकर अपने बेटे राजकुमार को “भविष्य का राजकुमार” बनाने का सपना पाल रही थी — अब अपने टूटे-बिखरे सपनों के सहारे किस उम्मीद से मजदूरी करेगी?

उसके पति महेन्द्र बर्मन तो पहले ही इस दुनिया से विदा हो चुके हैं।

आज सवाल सिर्फ एक बच्चे की मौत का नहीं है —
यह सिस्टम की संवेदनहीनता का सार्वजनिक पोस्टमार्टम है।

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