व्यापार डील या राजनीतिक दांव? भारत-अमेरिका समझौते की पूरी तस्वीर.
Trade deal or political gamble? The complete picture of the India–US agreement.
Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

भोपाल/नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम व्यापार समझौते ने भारतीय निर्यात जगत को बड़ी राहत दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों पर लगाए जाने वाले टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया जाएगा। इसके साथ ही रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत का अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ भी हटाने की घोषणा की गई है।
भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि अगले कुछ दिनों में भारत-अमेरिका की ओर से संयुक्त बयान जारी किया जाएगा और मार्च के मध्य तक औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। यह समझौता पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में पहला अहम चरण माना जा रहा है.
निर्यात सेक्टर के लिए बड़ी राहत
यह समझौता भारत के निर्यात-आधारित उद्योगों के लिए राहत लेकर आया है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, जहां से टेक्सटाइल, गारमेंट, चमड़ा, जूते, इंजीनियरिंग उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का बड़ा कारोबार जुड़ा हुआ है।
उच्च टैरिफ के कारण पिछले कुछ वर्षों से छोटे और मध्यम उद्योगों पर गहरा असर पड़ा था। अब 18 प्रतिशत टैरिफ से भारत को वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
- भारत के निर्यात में 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना है
- जीडीपी में 0.5 से 1 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है
- टेक्सटाइल, गारमेंट और लेदर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर बनेंगे
- भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार को 212 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य मजबूत होगा
राहत के साथ नई चिंता भी
जहां एक ओर यह समझौता निर्यातकों के लिए राहत बनकर सामने आया है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी दबाव में रूसी तेल आयात कम करने के संकेत भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकते हैं।
भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा रूस से सस्ते दामों पर खरीदता है। यदि इसमें कटौती होती है, तो तेल आयात महंगा होगा और इसका सीधा असर महंगाई तथा आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा।
अमेरिकी पक्ष के अनुसार भारत को ऊर्जा, विमान, सेमीकंडक्टर और अन्य क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ानी पड़ सकती है। हालांकि भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाएगा।
किसानों और घरेलू उद्योग पर असर की आशंका
इस समझौते के तहत अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने का दबाव भी भविष्य में बढ़ सकता है। इससे घरेलू किसानों और छोटे उत्पादकों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि निर्यात बढ़ने से रोजगार तो बढ़ेगा, लेकिन यदि आयात में तेज बढ़ोतरी हुई तो कुछ घरेलू उद्योगों को नुकसान भी हो सकता है।
राजनीतिक रूप से भी अहम सौदा
यह व्यापार समझौता राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्ताधारी दल के लिए यह समझौता मजबूत विदेश नीति और कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
निर्यात बढ़ने और रोजगार सृजन से ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों को भी नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है।
विशेष रूप से टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग हब वाले राज्यों में इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है।
फिलहाल राहत, आगे फैसला करेगा असली तस्वीर
फिलहाल यह समझौता भारत के लिए निर्यात के मोर्चे पर राहत लेकर आया है, लेकिन रूसी तेल, कृषि, डेयरी और ऊर्जा आयात जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम फैसले ही तय करेंगे कि यह डील भारत के लिए वास्तव में कितनी फायदेमंद साबित होती है।
अगले दौर की बातचीत पर अब देश की निगाहें टिकी हैं।