डिजिटल इंडिया या कॉर्पोरेट इंडिया? डेटा सेंटर नीति में किसके हित सुरक्षित.
Digital India or Corporate India? Whose interests are protected in the data centre policy?

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, नई दिल्ली/भोपाल । सरकार भले ही इसे “डिजिटल इंडिया” और “भविष्य का इंफ्रास्ट्रक्चर” बता रही हो, लेकिन बजट 2026 में डेटा सेंटर नीति को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, वह विकास से ज़्यादा कॉर्पोरेट वर्चस्व की पटकथा जैसी दिखती है।
बजट में साफ़ कर दिया गया है कि विदेशी क्लाउड और डेटा सेंटर सेवा कंपनियों को वर्ष 2047 तक आयकर में बड़ी राहत मिलेगी।
यानी Amazon, Google और Microsoft जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में डेटा सेंटर बनाएँगी, लेकिन उनसे मिलने वाला मुनाफ़ा भारत के ख़जाने तक नहीं पहुँचेगा।
▮ भारत की ज़मीन, भारत का पानी… मुनाफ़ा विदेश का
असल सवाल यह नहीं है कि डेटा सेंटर बनने चाहिए या नहीं।
असल सवाल यह है कि—
- ये बनेंगे किसके लिए?
- ज़मीन किसकी लगेगी?
- पानी कौन देगा?
- और कमाई किसके खाते में जाएगी?
नीति के तहत बड़े पैमाने पर ज़मीन उपलब्ध कराने में निजी कॉर्पोरेट समूहों की भूमिका पहले से तय मानी जा रही है। अडानी कॉनेक्स के माध्यम से नवी मुंबई, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हज़ारों एकड़ ज़मीन पर डेटा सेंटर पार्क विकसित किए जा रहे हैं।
यह केवल निवेश नहीं, बल्कि नीति और कॉर्पोरेट गठजोड़ की स्पष्ट तस्वीर है।
डेटा सेंटर – इमारत नहीं, इक्कीसवीं सदी का किला
डेटा सेंटर कोई साधारण बिल्डिंग नहीं होते।
यह वह ढांचा है, जहाँ—
- हर गूगल सर्च
- हर यूपीआई भुगतान
- हर आधार लेन-देन
- हर डिजिटल गतिविधि
का रिकॉर्ड मौजूद रहता है।
जिसके पास डेटा पर नियंत्रण, उसके पास सत्ता पर पकड़।
▮ पानी का संकट, लेकिन सर्वर को पूरी सप्लाई
सरकार “ग्रीन डेटा सेंटर” का दावा कर रही है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है।
एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर रोज़ करीब दस लाख लीटर पानी की खपत करता है।
बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर पहले ही भीषण जल संकट झेल रहे हैं।
कई इलाकों में लोग टैंकरों पर निर्भर हैं, लेकिन वहीं बड़े डेटा सेंटरों को नदियों और भूजल से लगातार पानी दिया जा रहा है।
किसानों के लिए पानी नहीं,
लेकिन सर्वर के लिए बिना रुकावट आपूर्ति।
इसे विकास नहीं, बल्कि जल-औपनिवेशिकरण कहना ज़्यादा सही होगा।
▮ ग्रीन दावा, लेकिन न ऑडिट न जवाबदेही
अधिकांश डेटा सेंटर अब भी पुरानी वाटर-कूलिंग तकनीक पर निर्भर हैं।
ना कोई सार्वजनिक पर्यावरण ऑडिट,
ना स्वतंत्र थर्ड पार्टी सत्यापन,
और ना ही स्थानीय समुदायों की सहमति।
▮ डेटा भारत में, लेकिन नियंत्रण अमेरिका का?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि
डेटा भले ही भारत में स्टोर हो,
लेकिन कंपनियाँ विदेशी हैं।
2013 में एडवर्ड स्नोडन खुलासा कर चुके हैं कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों तक की निगरानी करता रहा है।
ऐसे में अगर कल किसी विदेशी सरकार का दबाव आता है, तो भारत के पास अपने नागरिकों के डेटा को लेकर वास्तविक नियंत्रण कितना होगा?
▮ ईस्ट इंडिया कंपनी की डिजिटल वापसी?
इतिहास गवाह है—
ईस्ट इंडिया कंपनी भी व्यापार के बहाने ही आई थी।
तब मसाले थे,
आज डेटा है।
तब जहाज़ और तोपें थीं,
आज सर्वर और कॉन्ट्रैक्ट हैं।
तब लूट साफ दिखती थी,
आज उसे नीति का नाम दे दिया गया है।
▮ सवाल तकनीक का नहीं, शर्तों का है
यह लेख न विदेशी निवेश का विरोध करता है, न डिजिटल तकनीक से डर पैदा करता है।
सवाल सिर्फ़ इतना है—
अगर संसाधन भारत के हों,
जोखिम जनता का हो,
नियंत्रण कॉर्पोरेट का हो,
और मुनाफ़ा विदेश चला जाए—
तो इसे राष्ट्र निर्माण नहीं कहा जा सकता।
आज अगर सवाल नहीं पूछे गए,
तो कल जवाब माँगने का अधिकार भी नहीं बचेगा।
क्योंकि जब डेटा, पानी, ज़मीन और नीति एक ही दिशा में झुक जाएँ—
तो देश नहीं, कंपनियाँ चलती हैं।