फोर्टिफाइड चावल का काला खेल? FCI से एथेनॉल प्लांट तक की सप्लाई चेन पर बड़े सवाल.
The Dark Game of Fortified Rice? Big Questions Over the Supply Chain from FCI to the Ethanol Plant.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। सरकारी चावल की कथित हेराफेरी को लेकर मध्यप्रदेश में चल रही जांच के बीच अब फोर्टिफाइड चावल की बिक्री और उसके इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत सरकार के फूड कमिश्नर विश्वजीत हलधर से हुई चर्चा के अनुसार, खाने योग्य फोर्टिफाइड चावल को खुले बाजार में एथेनॉल कंपनियों को नहीं बेचा जा सकता। उनके अनुसार एथेनॉल उत्पादन के लिए केवल सरप्लस और पुराना चावल ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि खाने योग्य फोर्टिफाइड चावल एथेनॉल कंपनियों को नहीं बेचा जाना चाहिए, तो फिर सरकारी चावल की खेप एथेनॉल प्लांट तक पहुंचने के बजाय कथित तौर पर रास्ते में राइस मिलों तक कैसे पहुंची?
बालाघाट जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से फोर्टिफाइड चावल का वितरण किया जाता है। विशेष रूप से कुपोषण प्रभावित क्षेत्रों में इस चावल को पोषण सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। फोर्टिफाइड चावल में आवश्यक पोषक तत्व, विटामिन और खनिज मिलाए जाते हैं, ताकि इसके सेवन से कुपोषण के प्रभाव को कम किया जा सके।
यही वजह है कि सरकारी चावल की आपूर्ति, भंडारण और वितरण व्यवस्था में किसी भी प्रकार की कथित हेराफेरी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
फोर्टिफाइड चावल बनाम एथेनॉल: सरकारी नीति और जमीनी हकीकत में कितना अंतर?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा गोदामों को खाली करने के उद्देश्य से वर्ष 2023-24 में उपार्जित चावल को ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) के तहत एथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों को उपलब्ध कराया गया।
दावा किया जा रहा है कि जून 2025 से जून 2026 के बीच FCI द्वारा एथेनॉल कंपनियों को लगभग 63.5 लाख टन चावल उपलब्ध कराया गया, जिसकी अनुमानित कीमत ₹14,596.78 करोड़ बताई जा रही है।
बताया गया है कि एथेनॉल कंपनियों को यह चावल लगभग ₹2,250 से ₹2,320 प्रति क्विंटल की दर पर उपलब्ध कराया गया, जबकि इसका लागत मूल्य कथित तौर पर ₹3,720 से ₹3,889 प्रति क्विंटल के बीच आंका गया था।
यदि ये आंकड़े सही हैं, तो लागत मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकारी चावल की बिक्री से सरकारी खजाने को आर्थिक नुकसान हुआ और यदि हुआ तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
हालांकि, इन आंकड़ों और बिक्री प्रक्रिया की आधिकारिक पुष्टि तथा विस्तृत वित्तीय ऑडिट के निष्कर्ष सामने आना आवश्यक है।
वारासिवनी में पकड़ा गया सरकारी चावल से लदा ट्रक, एथेनॉल प्लांट से जुड़ी खेप पर सवाल
जून के पहले सप्ताह में वारासिवनी क्षेत्र की एक राइस मिल से कथित तौर पर सरकारी चावल से लदा एक ट्रक पकड़े जाने का मामला सामने आया था। बताया गया कि यह चावल छिंदवाड़ा स्थित एवीजे एथेनॉल प्लांट पहुंचाया जाना था।
पुलिस के अनुसार, ट्रक चालक के पास चावल से संबंधित आवश्यक वैधानिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं पाए जाने के बाद ट्रक को जब्त किया गया और राइस मिल मालिक, पार्टनर तथा ट्रक चालक के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया। मामले की जांच विशेष जांच दल (SIT) द्वारा की जा रही है।
इस घटनाक्रम ने सरकारी चावल की परिवहन व्यवस्था और दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि चावल की खेप कहां से चली, किस उद्देश्य से भेजी गई और वह निर्धारित गंतव्य तक पहुंची या नहीं।
FCI गोदाम से निकले ट्रकों का रूट बदला तो सवाल भी उठे, अब SIT जांच पर नजर
इस मामले से पहले जनवरी 2026 के प्रथम सप्ताह में बालाघाट जिले के नैतरा स्थित FCI गोदाम से एवीजे एथेनॉल प्लांट, बोरगांव, छिंदवाड़ा के लिए चार ट्रकों के रवाना होने की जानकारी सामने आई थी।
बताया गया कि इनमें से तीन ट्रकों को खैरलांजी पुलिस ने सूचना के आधार पर रोका था। आरोप है कि ट्रक चालकों के पास चावल से संबंधित आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। इसके बाद वारासिवनी एसडीएम मौके पर पहुंचे और जानकारी लेने के बाद ट्रकों को बिना कार्रवाई के छोड़ दिया गया।
यदि ट्रकों के पास आवश्यक दस्तावेज नहीं थे और वे निर्धारित गंतव्य की दिशा में जाने के बजाय कथित रूप से दूसरी दिशा में जा रहे थे, तो यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है। साथ ही, बिना कार्रवाई के ट्रकों को छोड़े जाने के निर्णय की भी प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या उस समय छोड़े गए ट्रकों और बाद में सामने आए चावल घोटाले के बीच कोई संबंध था? क्या उन ट्रकों की लोकेशन, जीपीएस रिकॉर्ड, ई-वे बिल, परिवहन दस्तावेज और संबंधित राइस मिलों के रिकॉर्ड की जांच की गई?
करीब 10 हजार मीट्रिक टन चावल की सप्लाई पर भी उठे सवाल
मामले में एवीजे कंपनी, छिंदवाड़ा से जुड़े लगभग 10 हजार मीट्रिक टन चावल की आपूर्ति का भी उल्लेख सामने आया है। आरोप है कि FCI के विभिन्न गोदामों से भेजा गया चावल निर्धारित एथेनॉल प्लांट तक पहुंचने के बजाय कथित रूप से रास्ते में ही अन्य राइस मिलों तक पहुंच गया।
यदि जांच में यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल परिवहन में अनियमितता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी चावल की आपूर्ति श्रृंखला में गंभीर गड़बड़ी और संभावित आपराधिक षड्यंत्र का विषय बन सकता है।
ऐसे में SIT के लिए पहले पकड़े गए ट्रकों की भी दोबारा गहन जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। ट्रकों की GPS लोकेशन, टोल रिकॉर्ड, ई-वे बिल, चालक के मोबाइल लोकेशन, FCI डिस्पैच रिकॉर्ड और संबंधित राइस मिलों के स्टॉक रजिस्टर का मिलान किया जाए तो कथित नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर सरकारी चावल एथेनॉल प्लांट के लिए निकला था, तो वह रास्ते में दूसरी राइस मिलों तक कैसे पहुंचा? और अगर उस समय ट्रकों के दस्तावेज अधूरे थे, तो उन्हें बिना कार्रवाई के क्यों छोड़ा गया?
बालाघाट से उठे ये सवाल अब केवल एक जिले तक सीमित नहीं हैं। इनका जवाब उस पूरी सप्लाई चेन से जुड़ा है, जिसके जरिए सरकारी चावल FCI गोदाम से निकलकर अपने निर्धारित गंतव्य तक पहुंचता है।
SIT की जांच में यदि पुराने मामलों, जब्त ट्रकों और संदिग्ध परिवहन मार्गों को भी शामिल किया जाता है, तो सरकारी चावल की कथित हेराफेरी की कई महत्वपूर्ण कड़ियां सामने आ सकती हैं। फिलहाल, जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और आधिकारिक निष्कर्ष का इंतजार है।
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