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मीडिया बदल रहा है या मर रहा है? डिजिटल दौर में पत्रकारिता की निर्णायक लड़ाई.

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Is the media changing or dying? The decisive battle for journalism in the digital age.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल, आज का मीडिया परिदृश्य पूरी तरह उलट-पुलट हो चुका है।
पारंपरिक अखबार और टेलीविजन चैनल गहरे संकट में फंसे नजर आ रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म खबरों के सबसे बड़े स्रोत बन चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रिंट मीडिया का असर तेजी से घट रहा है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनता का भरोसा लगातार खो रहा है।

इस बदलते दौर की सबसे बड़ी चेतावनी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से ही मिल चुकी है।
अमेरिका का प्रतिष्ठित अखबार The Washington Post बड़े पैमाने पर छंटनी कर चुका है। सैकड़ों पत्रकार प्रभावित हुए और कई विभाग बंद कर दिए गए।

भारत में हालात इससे अलग नहीं हैं।

कई बड़े हिंदी दैनिकों की प्रसार संख्या लगातार गिर रही है। कई शहरों से उनके एडिशन बंद हो चुके हैं। टीवी चैनलों की स्थिति और ज्यादा चिंताजनक है—
कई चैनल घाटे में चल रहे हैं, कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा और कई जगह पत्रकारों की छंटनी हो चुकी है।

विज्ञापन चला गया, सिस्टम ढह गया

मीडिया संकट की सबसे बड़ी वजह विज्ञापन बाजार का पलायन है।
विज्ञापनदाता अब प्रिंट और टीवी से दूरी बनाकर सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निवेश कर रहे हैं। कोरोना काल के बाद कई अखबार और पत्रिकाएं पूरी तरह बंद हो गईं, जिसने पारंपरिक मीडिया की कमजोर आर्थिक रीढ़ को उजागर कर दिया।

खबर अब न्यूज़रूम से नहीं, मोबाइल से निकल रही है

आज किसी भी घटना की पहली तस्वीर और पहला वीडियो अब न्यूज़ चैनलों पर नहीं, बल्कि
X,
YouTube और
Facebook
जैसे प्लेटफॉर्म पर दिखाई देता है।

चाहे राजनीतिक प्रदर्शन हो, स्थानीय विवाद हो या बड़ा घोटाला—
खबर पहले सोशल मीडिया पर आती है, बाद में टीवी स्टूडियो तक पहुंचती है।

आज दर्शक और पाठक पारंपरिक चैनलों के एंकरों की जगह इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट, ग्राउंड रिपोर्टर्स और व्यक्तिगत क्रिएटर्स पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं, क्योंकि वहां—

  • खबर तेज मिलती है
  • संपादन का दबाव कम दिखता है
  • और कई बार सच्चाई ज्यादा नंगी होकर सामने आती है

असली संकट TRP नहीं, भरोसे का है

पारंपरिक मीडिया की सबसे बड़ी परेशानी उसकी गिरती विश्वसनीयता है।
खबरों में बार-बार पक्षपात, सत्ता के पक्ष में खड़े नजर आने वाले एंगल और जरूरत से ज्यादा सनसनी फैलाने की प्रवृत्ति ने दर्शकों को दूर कर दिया है।

अब ब्रेकिंग न्यूज और गंभीर विश्लेषण के लिए लोग टीवी स्क्रीन की तरफ नहीं, मोबाइल स्क्रीन की तरफ देख रहे हैं।

यह सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि मीडिया पर जनता के भरोसे का संकट है।

क्या प्रिंट और टीवी खत्म हो जाएंगे?

हकीकत यह है कि प्रिंट मीडिया पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसका स्वरूप बदल जाएगा।
भविष्य में प्रिंट मीडिया—

  • स्थानीय मुद्दों
  • जमीनी रिपोर्टिंग
  • खोजी पत्रकारिता
  • और प्रीमियम विश्लेषण

तक सीमित होता जाएगा।

वहीं त्वरित अपडेट, लाइव कवरेज और वीडियो आधारित खबरों पर डिजिटल मीडिया का वर्चस्व रहेगा।

टीवी चैनल भी मजबूरी में ऑनलाइन स्ट्रीमिंग और हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि केवल केबल और DTH के भरोसे अब कारोबार नहीं चल पा रहा।

हाँ, ग्रामीण इलाकों में जहां आज भी इंटरनेट सीमित है, वहां प्रिंट मीडिया कुछ हद तक अपनी पकड़ बनाए रखेगा।

युवा पत्रकारों के लिए यह दौर चेतावनी भी है और मौका भी

जो युवा पत्रकारिता में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह दौर सिर्फ जोश का नहीं, समझदारी का है।

अब सिर्फ रिपोर्ट लिखना काफी नहीं है।
उन्हें—

  • डिजिटल टूल्स
  • वीडियो स्टोरीटेलिंग
  • डेटा जर्नलिज्म
  • सोशल मीडिया पब्लिशिंग
  • और मल्टी-प्लेटफॉर्म कंटेंट

में दक्ष होना अनिवार्य हो गया है।

पुराने ढर्रे की पत्रकारिता पर टिके रहना आज के दौर में सीधा जोखिम है।

असली सवाल—मीडिया किसके साथ खड़ा है?

मीडिया का मूल उद्देश्य—
सत्ता से सवाल करना, समाज को जागरूक करना और सच्चाई सामने लाना— आज भी वही है।

लेकिन जब मीडिया खुद सत्ता के साथ खड़ा नजर आने लगे,
तो डिजिटल प्लेटफॉर्म उसका विकल्प बन जाते हैं।

आज मीडिया का संकट तकनीक का नहीं,
नैतिकता और भरोसे का संकट है।

यही वजह है कि यह बदलाव केवल चुनौती नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता के लिए बड़ा अवसर भी है—
जो सत्ता नहीं, सच के साथ खड़ी हो।

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