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मीडिया वेंटिलेटर पर, सरकार विज्ञापनों से चला रही पसंदीदा चैनल!

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Media on a ventilator, the government is keeping its favourite channels alive with advertisements!

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

नई दिल्ली/भोपाल। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के ताजा आंकड़ों ने भारतीय मीडिया उद्योग के भीतर चल रहे गंभीर और संरचनात्मक संकट को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

पिछले तीन वर्षों (2023 से 2026) के बीच करीब 50 टीवी चैनलों ने अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर दिए हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि इस सूची में जियोस्टार, ज़ी एंटरटेनमेंट, एनडीटीवी, एबीपी नेटवर्क और टीवी टुडे नेटवर्क जैसे देश के बड़े और स्थापित मीडिया समूह भी शामिल हैं।

बड़े ब्रांड, बंद होते चैनल

जियोस्टार ने कलर्स ओडिया, एमटीवी बीट्स, वीएच1 और कॉमेडी सेंट्रल जैसे चैनलों के लाइसेंस सरेंडर किए हैं।

एनडीटीवी ने अपने प्रस्तावित एचडी न्यूज़ चैनल—

  • एनडीटीवी इंडिया एचडी
  • एनडीटीवी 24×7 एचडी
  • एनडीटीवी प्रॉफिट एचडी

की अनुमति वापस ले ली है।

वहीं, एबीपी नेटवर्क ने एबीपी न्यूज़ एचडी को बंद कर दिया है और कई क्षेत्रीय चैनल भी इस दौर में बंद हो चुके हैं।

डिजिटल की आंधी में ढहता टीवी मॉडल

यह संकट सिर्फ चैनलों के बंद होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे डिजिटल शिफ्ट का नतीजा है।

  • वर्ष 2025 तक कनेक्टेड टीवी यूजर्स 129 मिलियन तक पहुंच चुके हैं।
  • वहीं, डीटीएच सब्सक्राइबर 72 मिलियन से घटकर लगभग 62 मिलियन रह गए हैं।
  • टीवी विज्ञापन राजस्व 2025 में 1.5% गिरकर 47,740 करोड़ रुपये रह गया।
  • इसके उलट, देश का कुल विज्ञापन बाजार 9.2% की वृद्धि के साथ 1.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

सीधा संकेत यह है कि विज्ञापन का पैसा अब तेजी से ओटीटी, यूट्यूब और सोशल मीडिया की ओर बह रहा है और पारंपरिक टीवी माध्यम धीरे-धीरे वेंटिलेटर पर पहुंचता जा रहा है।

प्रिंट मीडिया: दिखती बढ़त, भीतर गहराता संकट

ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) के जनवरी–जून 2025 के आंकड़ों के अनुसार—

दैनिक अखबारों का कुल परिसंचरण 2.77 प्रतिशत बढ़कर 2.97 करोड़ प्रतियां हो गया है।

हिंदी अखबारों में—

  • दैनिक भास्कर – 30.4 लाख
  • दैनिक जागरण – 23.5 लाख
  • अमर उजाला

जबकि अंग्रेजी में टाइम्स ऑफ इंडिया शीर्ष पर बना हुआ है।

लेकिन यह बढ़त मुख्य रूप से ग्रामीण और टियर-3 क्षेत्रों से आई है।
टियर-1 और टियर-2 शहरों में अखबारों का परिसंचरण 10 से 12 प्रतिशत तक गिर चुका है।

युवा पाठक तेजी से—

  • व्हाट्सएप (करीब 53 करोड़ यूजर्स),
  • यूट्यूब
  • और सोशल मीडिया

की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।

प्रिंट विज्ञापन बढ़ा, लेकिन असली सच्चाई कुछ और

वर्ष 2025 में प्रिंट विज्ञापन में भले ही 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हो, लेकिन यह बढ़त वॉल्यूम नहीं, बल्कि रेट बढ़ोतरी के कारण है।
यानी विज्ञापन पन्ने नहीं बढ़े, सिर्फ कीमतें बढ़ीं।

सबसे बड़ा सवाल: सरकारी विज्ञापन और जनधन की बंदरबांट

अब यह संकट केवल बाजार का नहीं, बल्कि नीतियों और सरकारी विज्ञापन व्यवस्था का भी बन चुका है।

देश के कई राज्यों में लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि—

  • ‘मित्र मीडिया’ को प्राथमिकता दी जाती है,
  • और आलोचक या स्वतंत्र माध्यमों को विज्ञापन से वंचित रखा जाता है।

उत्तराखंड से महाराष्ट्र तक उदाहरण

उत्तराखंड में वर्ष 2021 से 2025 के बीच सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा 1,001 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सरकारी विज्ञापनों पर खर्च की गई।
आरोप है कि कम पहुंच वाले चैनलों और माध्यमों को भी करोड़ों रुपये दिए गए।

महाराष्ट्र में 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकारी विज्ञापन में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को लेकर स्वतंत्र समिति गठित करने का आदेश दिया।

असम, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी सरकारी विज्ञापन नीति को लेकर इसी तरह की शिकायतें सामने आ चुकी हैं।

कागज पर चलने वाले’ अखबार और असली मीडिया

छोटे और क्षेत्रीय अखबार आज भी सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं,
लेकिन कई ऐसे प्रकाशन भी सक्रिय हैं जो जमीनी स्तर पर न के बराबर पहुंच रखते हुए भी सरकारी फंड हासिल कर लेते हैं।

केंद्र स्तर पर सरकारी विज्ञापन खर्च लगातार बढ़ रहा है,
लेकिन पारदर्शिता और स्वतंत्र मूल्यांकन की कमी जनधन के दुरुपयोग को जन्म दे रही है।

जब जनता डिजिटल पर जा चुकी है, तो पुरानी नाव में पैसा क्यों?

सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यही है कि—

जब नागरिक बड़ी संख्या में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जा चुके हैं,
तो पुराने और अप्रभावी माध्यमों को सरकारी पैसों के सहारे कृत्रिम रूप से जिंदा रखना आखिर किस हित में है?

इससे—

  • मीडिया की विश्वसनीयता कमजोर हो रही है,
  • सनसनीखेज कंटेंट को बढ़ावा मिल रहा है,
  • और जनहित की पत्रकारिता लगातार पीछे छूटती जा रही है।

यह केवल मीडिया का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र का संकट है।

अब क्या होना चाहिए? – तत्काल सुधार जरूरी

  • सरकारी विज्ञापन नीतियों का स्वतंत्र ऑडिट और पुनर्गठन
  • व्यूअरशिप, परिसंचरण और डिजिटल एंगेजमेंट आधारित विज्ञापन आवंटन
  • बेहद कम पहुंच वाले माध्यमों को सरकारी विज्ञापन से बाहर करना
  • पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए राजनीतिक और वैचारिक भेदभाव पर रोक
  • सरकारी संसाधनों का निवेश
    • डिजिटल पत्रकारिता,
    • सामुदायिक रेडियो,
    • फील्ड रिपोर्टिंग
    • और फैक्ट-चेक आधारित प्लेटफॉर्म्स में

अंतिम सवाल

यदि नीतियां पुराने ढर्रे पर ही अटकी रहीं,
तो देश में सरकारी विज्ञापन का पैसा लगातार ‘गलत पेट में भोजन’ बनता रहेगा।

मीडिया का भविष्य डिजिटल है।
अब समय आ गया है कि सरकारें पुरानी, डूबती नाव में ईंधन झोंकने के बजाय
एक नई, प्रभावी और जवाबदेह मीडिया व्यवस्था में निवेश करें।

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