अस्पष्ट नियम, खतरनाक संकेत: सुप्रीम कोर्ट ने UGC को दिखाया आईना.
Supreme Court puts UGC’s controversial new regulations on hold
Vague Rules, Dangerous Signals: Supreme Court Shows UGC the Mirror
Special Correspondent, Richa Tiwari, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, भोपाल, विश्वविद्यालयों में समानता और समावेशन के नाम पर बनाए गए यूजीसी के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि नियम न केवल अस्पष्ट हैं, बल्कि इनके दुरुपयोग की गंभीर आशंका भी है। इसी आधार पर कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से इन पर रोक लगा दी।
2012 के नियमों में लौटना क्यों पड़ा?
कोर्ट का आदेश अपने आप में सवाल खड़ा करता है—अगर नए नियम वास्तव में सुधार के लिए थे, तो उन्हें पुराने नियमों से बेहतर क्यों नहीं बनाया गया? चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि जब तक स्पष्ट और संतुलित ढांचा सामने नहीं आता, तब तक 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।
‘3E होते हुए 2C क्यों?’—कोर्ट का सीधा सवाल
जस्टिस जॉयमाल्या बागची का यह सवाल सिर्फ कानूनी नहीं, नीतिगत भी है। अदालत ने संकेत दिया कि मौजूदा प्रावधानों के रहते नए वर्गीकरण समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ सकते हैं।
क्या सामान्य वर्ग को दोषी ठहराने की नीति?
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के सामने बड़ा आरोप लगाया—कि नया नियम यह मानकर चलता है कि सामान्य श्रेणी के छात्र भेदभाव करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच को संविधान की आत्मा के खिलाफ माना।
‘75 साल बाद भी जाति से मुक्त नहीं?’—CJI की पीड़ा
चीफ जस्टिस की टिप्पणी सिर्फ कानूनी नहीं, सामाजिक चेतावनी भी है। उन्होंने सवाल किया कि क्या देश एक वर्गहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय फिर से पहचान-आधारित खांचों में लौट रहा है?
अमेरिका की गलतियों से सबक लेने की नसीहत
जस्टिस बागची ने अमेरिका में नस्लीय अलगाव का उदाहरण देते हुए चेताया कि भारत को शिक्षा के माध्यम से किसी भी तरह का संस्थागत विभाजन नहीं अपनाना चाहिए।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि प्रतिष्ठित और निष्पक्ष लोगों की समिति बनाकर नए सिरे से विचार किया जाए। सवाल यही है—क्या यूजीसी इसे अवसर की तरह लेगा या फिर एक और विवाद को जन्म देगा?