आश्वासन की राजनीति, आशा की बदहाली—मैहर से उठे सवाल.
छह माह से वेतन न मिलने पर मैहर में आशा कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन
Politics of assurances, plight of ASHA workers—questions rise from Maihar.
Special Correspondent, Maiher, MP Samwad News.
MP संवाद, मैहर, स्वास्थ्य सेवाओं की नींव कही जाने वाली आशा कार्यकर्ता आज खुद व्यवस्था की बेरुखी का शिकार हैं। छह माह से मानदेय नहीं, खाली आश्वासन और बढ़ता घरेलू संकट—इसी पीड़ा ने आशा कार्यकर्ताओं को खून से पत्र लिखने पर मजबूर कर दिया।
मुख्यमंत्री के नाम खून से लिखा गया पत्र सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है जो गर्भवती महिलाओं और नवजातों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाली महिलाओं को महीनों तक मेहनताना देने में नाकाम रहा है।
स्वास्थ्य की रीढ़ भूखी, सिस्टम बेफिक्र
गांव-गांव जाकर टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की देखरेख और सरकारी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने वाली आशा कार्यकर्ता आज खुद इलाज और भोजन की चिंता में हैं। आंदोलन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ने लगा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी अब तक सिर्फ आश्वासन ही दे पाए हैं।
आश्वासन बनाम हकीकत
बीएमओ ने 15 दिन में भुगतान का भरोसा दिया है, लेकिन सवाल यह है—
👉 क्या आशा कार्यकर्ताओं का मानदेय हमेशा आंदोलन के बाद ही मिलेगा?
👉 क्या सरकार की योजनाओं का बोझ उठाने वाली महिलाओं की मेहनत की यही कीमत है?
आशा कार्यकर्ताओं ने दो टूक कहा है—
“जब तक वेतन नहीं, तब तक काम नहीं।”
मैहर का यह आंदोलन अब सिर्फ वेतन का नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार की लड़ाई बन चुका है।
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