आदिवासी कल्याण या अफसरों की कमाई? बैतूल घोटाले ने खोले राज.
आदिवासी छात्रावासों के नाम पर फर्जी खातों में सरकारी राशि ट्रांसफर होने का खुलासा
Tribal Welfare or Officials’ Earnings? Betul Scam Exposes the Truth.
Special Correspondent, Betul, MP Samwad News.
MP संवाद, बैतूल। आदिवासी बच्चों की पढ़ाई और छात्रावासों की बुनियादी सुविधाओं के नाम पर जनपद पंचायत बैतूल में जो खेल खेला गया, उसने सिस्टम की सड़ांध को बेनकाब कर दिया है। बिजली के बिल—जो रोशनी के लिए थे—वही अफसरों और कर्मचारियों के लिए कमाई का जरिया बन गए।
जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावासों के बिजली बिलों का भुगतान जनपद पंचायत के डीडीओ कोड से होता रहा, लेकिन पैसे असली बिजली कंपनी के खाते में नहीं, बल्कि चार निजी व्यक्तियों के खातों में पहुंचते रहे। यह सिलसिला एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे दो वर्षों तक बेरोकटोक चलता रहा और करीब 40 लाख रुपये की शासकीय राशि गबन कर ली गई।
घोटाले का पर्दाफाश तब हुआ, जब जनपद पंचायत की सीईओ शिवानी राय ने नियमित जांच के दौरान बिल भुगतान खातों पर सवाल उठाए। जांच में साफ हुआ कि MPEB के नाम पर बनाए गए फर्जी खातों के जरिए सरकारी खजाने में सेंध लगाई गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब कुछ सिस्टम के अंदर रहकर हुआ। प्राथमिक जांच में कंप्यूटर ऑपरेटर ने खाते के नंबर बदलने की बात स्वीकार कर ली है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अकेला ऑपरेटर दो साल तक 40 लाख का खेल कर सकता था?
अब कोतवाली पुलिस ने दो आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है, लेकिन आदिवासी बच्चों के हक पर डाका डालने वाले पूरे नेटवर्क तक पहुंचना पुलिस और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।
यह मामला सिर्फ गबन का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जो आदिवासी कल्याण के नाम पर बजट तो जारी करती है, लेकिन उसकी निगरानी नहीं करती।
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